दरअसल, यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस को प्रतिबंधों से लाद दिया है। इससे रूस को विदेशी मुद्रा हासिल करने में बहुत मुश्किलें हो रही हैं। संकट की इस घड़ी में भारत और चीन ने रूस की मदद की है। भारत ने संयुक्‍त राष्‍ट्र में रूस के खिलाफ लगे प्रतिबंधों का समर्थन नहीं किया। रूस भारत को बहुत ही सस्‍ती दर पर तेल मुहैया कर रहा है। यही नहीं भारत और रूस के बीच व्‍यापार भी बहुत तेजी से लगातार बढ़ रहा है। भारत और रूस के बीच अप्रैल से अगस्‍त 2022 के बीच आयात निर्यात 16.46 अरब डॉलर तक पहुंच गया। अप्रैल से अगस्‍त के बीच रूस भारत को तेल का निर्यात करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश बन गया है।
Russia Ukraine War: यूक्रेन से जंग के बीच डांस करती दिखीं पुतिन की गर्लफ्रेंड, Z वाला बैज पहन रूसी सेना का किया समर्थन

CIA Modi Putin: पीएम मोदी के 'जबरा फैन' क्यों बने पुतिन? एक इशारे पर छोड़ा यूक्रेन में परमाणु बम गिराने का प्लान, समझें

CIA Chief On Modi And Russia: रूस के राष्‍ट्रपति व्‍लादिमीर पुतिन को लगातार यूक्रेन को महाविनाशक हथियारों के लिए धमका रहे हैं लेकिन रूस ने अब तक इससे परहेज किया है। अब अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के चीफ विलियम बर्न्‍स ने कहा है कि पीएम मोदी ने जो पुतिन को परमाणु बम के इस्‍तेमाल पर सलाह दी, उसका असर पड़ा।

pm modi putin.

पुतिन ने पीएम मोदी की मानी सलाह, नहीं गिराया परमाणु बम

हाइलाइट्स

  • रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू हुए 10 महीने हो गए हैं और यह जंग लगातार जा रही है
  • इस जंग में रूसी सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा है, वहीं यूक्रेन ने भी 1/5 जमीन गंवा दी
  • सीआईए चीफ ने कहा कि पीएम मोदी ने यूक्रेन में परमाणु युद्ध को रोकने में अहम भूमिका निभाई

भारत ने जी-20 शिखर सम्‍मेलन में निभाई बड़ी भूमिका

अमेरिका अक्‍सर पीएम मोदी के उस बयान को दोहराता रहा है जिसमें उन्‍होंने समरकंद में पुत‍िन के साथ मुलाकात के दौरान कहा था कि यह युद्ध का दौर नहीं है। इससे पहले भारत ने बाली में जी-20 शिखर सम्‍मेलन के दौरान रूस और पश्चिमी देशों के बीच सामंजस्‍य बैठाया था। यही नहीं पीएम मोदी के चर्चित बयान 'यह दौर युद्ध का नहीं है' को जी-20 के साझा बयान में शामिल किया गया था। पश्चिमी मीडिया का भी मानना है कि भारत अपने दोस्‍त रूस को युद्ध रोकने के लिए मध्‍यस्‍थ की भूमिका निभा सकता है। विश्‍लेषकों का मानना है कि पुतिन ने यूं ही नहीं भारतीय प्रधानमंत्री की अपील को माना। इसके पीछे दोनों के बीच ऐतिहासिक दोस्‍ती और परस्‍पर निर्भरता एक बड़ी वजह है।

दरअसल, यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस को प्रतिबंधों से लाद दिया है। इससे रूस को विदेशी मुद्रा हासिल करने में बहुत मुश्किलें हो रही हैं। संकट की इस घड़ी में भारत और चीन ने रूस की मदद की है। भारत ने संयुक्‍त राष्‍ट्र में रूस के खिलाफ लगे प्रतिबंधों का समर्थन नहीं किया। रूस भारत को बहुत ही सस्‍ती दर पर तेल मुहैया कर रहा है। यही नहीं भारत और रूस के बीच व्‍यापार भी बहुत तेजी से लगातार बढ़ रहा है। भारत और रूस के बीच अप्रैल से अगस्‍त 2022 के बीच आयात निर्यात 16.46 अरब डॉलर तक पहुंच गया। अप्रैल से अगस्‍त के बीच रूस भारत को तेल का निर्यात करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश बन गया है।
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S-400 से लेकर असॉल्‍ट राइफल तक खरीद रहा भारत


भारत ने रूस से मुख्‍य तौर पर पेट्रोलियम, फर्टिलाइजर, कॉफी, चाय और मसालों का आयात किया। इन आयात में तेल और फर्टिलाइजर का हिस्‍सा 90 प्रतिशत तक है। आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल से अगस्‍त के बीच रूस से तेल आयात पिछले साल इसी अवधि में हुए आयात से 16 फीसदी ज्‍यादा है। माना जा रहा है कि यह अभी और बढ़ने जा रहा है। भारतीय कंपनियां रूस से सस्‍ता तेल खरीदकर उसे निर्यात करने जा रहा है। वहीं अक्‍टूबर में भारत का निर्यात 31 अरब डॉलर का रहा। रूस पिछले साल तक भारत के साथ व्‍यापार में 25वें स्‍थान पर था लेकिन अब साल 2022 में मास्‍को सातवां सबसे बड़ा व्‍यापारिक साझीदार बन गया है। इसके अलावा भारत रूस से एस-400 से लेकर असॉल्‍ट राइफल तक खरीद रहा है। रूस को इससे अरबों डॉलर की कमाई होती है। ऐसे में पुतिन को पीएम मोदी की सलाह पर तवज्‍जो देना ही पड़ा।

डालर बनाम रुपया

विभिन्न घरेलू और वैश्विक कारकों के कारण अमेरिकी डालर के मुकाबले भारतीय रुपए में लगभग सात फीसद की गिरावट आई है ।

डालर बनाम रुपया

तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फाइल फोटो)

रुपए के उल्लेखनीय लचीलेपन के बावजूद इसकी कीमत में तेजी से गिरावट आई है। मगर पिछली बार की तुलना में अपेक्षाकृत यह गिरावट कम रही है। विभिन्न घरेलू और वैश्विक कारकों के कारण अमेरिकी डालर के मुकाबले भारतीय रुपए में लगभग सात फीसद की गिरावट आई है, विशेष रूप से, व्यापक चालू खाता घाटा, भू-राजनीतिक तनाव के परिणामस्वरूप लगातार जोखिम और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा निरंतर बिकवाली इस गिरावट का कारण है।

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि डालर दुनिया की सभी मुद्राओं के मुकाबले मजबूत हुआ है। जून 2022 में अमेरिका में मुद्रास्फीति 9.1 प्रतिशत के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गई। इसने अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति में उलटफेर को प्रेरित किया। अमेरिका में मुद्रास्फीति में बेरोकटोक वृद्धि के कारण आने वाले कुछ महीनों तक अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि जारी रखने की उम्मीद है। आज डालर विश्व की अन्य मुद्राओं के मुकाबले पिछले बीस साल के सारे रिकार्ड तोड़ चुका है।

भले ही रुपया डालर के मुकाबले तेजी से गिर गया हो, पर पिछले संकट की तुलना में मूल्यह्रास अपेक्षाकृत कम रहा है जैसे कि 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट जब आया तो रुपया बीस फीसद से अधिक कमजोर हो गया था और 2013 का टेंपर टेंट्रम के दौरान रुपए में ग्यारह फीसद से अधिक की गिरावट आई थी।

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2022 में सात फीसद की गिरावट रहने का श्रेय भारत की बदली विदेश नीति को जाता है, क्योंकि अमेरिकी दबाव के बावजूद रूस से सस्ता कच्चा तेल लेते रहना इसका प्रमुख कारण है या रुपए के मूल्य में गिरावट को नियंत्रित करने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करने के अलावा, आरबीआइ ने हाल ही में भारत में विदेशी निवेश को उदार बनाया और निवेश को अधिक आकर्षक बनाया। अन्य देशों और भारत के बीच रुपए में व्यापार को बढ़ावा देने, नई विदेशी मुद्रा जमा पर बढ़ी ब्याज दरों ने रुपए की गिरावट को नियंत्रित करने में योगदान दिया है।
परमवीर ‘केसरी’, मेरठ

वैमनस्य की राजनीति

आजादी के पूर्व देश में जातिवाद ,धार्मिक भेदभाव नहीं था। सभी धर्म के अनुयायी अपने अपने धर्म का पालन करते हुए भाईचारे के साथ रह रहे थे। पर अब राजनीतिक दल अपने फायदे के लिए खाई चौड़ी करने का काम कर रहे हैं, जिसका आने वाली पीढ़ी को परिणाम भुगतना पड़ेगा। वैचारिक प्रदूषण ज्यादा खतरनाक है, जो कि ज्यादा तेजी से फैल रहा है। देश में हर जगह वैचारिक बारूद के ढेर तैयार हो रहे हैं।

हमारे अध्यात्म, योग तथा ध्यान का लाभ विदेशी लोग ले रहे हैं और हम वैचारिक प्रदूषण से गर्त में जा रहे हैं। अब भी समय है राजनीति के अल्प फायदे को छोड़ कर धर्म, जाति के भेदभाव का त्याग करें। सबको अपने-अपने धर्म का पालन करते हुए अहिंसा परमो धर्म: के सिद्धांत के साथ भा चारे के साथ जीवनयापन करने की प्रेरणा दें।

राजनीति करें, किंतु वैचारिक प्रदूषण फैला कर नहीं, देश के विकास के मुद्दे पर चर्चा करें। खुशहाली के लिए काम करें। राष्ट्र सर्वोपरि है, यह सिद्धांत हर देशवासी के मन मस्तिष्क में फैलाएं। हम आप आज हैं, कल नहीं रहेंगे, किन्तु देश रहेगा।
अरविंद जैन ‘बीमा’, उज्जैन

विदेशी मुद्रा खतरनाक क्यों है?

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रूस-चीन सोचते रह गए लेकिन भारत ने कर दिखाया, अमेरिका डॉलर को पछाड़कर भारतीय रुपया बनने जा रहा इंटरनेशल करेंसी; जानें कैसे

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बिज़नेस न्यूज़ डेस्क - जब पूरी दुनिया कोरोना महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण संकट में है, तब भारत ने एक ऐसा बड़ा काम शुरू किया है, जो आगे चलकर सही मायने में दुनिया की दूसरी महाशक्ति के रूप में स्थापित होगा। पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने रुपये को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनाने की पहल शुरू की है, जिसे अच्छा रिस्पॉन्स भी मिलना शुरू हो गया है। अगर यह पहल सफल होती है तो अमेरिकी डॉलर के अलावा रुपया दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बन जाएगा। जिसके बाद आप भारतीय रुपये से दुनिया में कहीं भी खरीदारी कर सकेंगे। सहयोगी वेबसाइट WION के मुताबिक, अमेरिकी डॉलर की किल्लत से जूझ रहे श्रीलंका ने यहां स्पेशल रुपी ट्रेडिंग अकाउंट शुरू किया है ऐसे खातों को वोस्त्रो खाते भी कहा जाता है। इस खाते को खोलने के बाद श्रीलंका के सेंट्रल बैंक ऑफ श्रीलंका (CBSL) ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से श्रीलंका में भारतीय रुपये को विदेशी मुद्रा के रूप में मान्यता देने का अनुरोध किया है। श्रीलंका ने आरबीआई से श्रीलंका सहित विदेशी मुद्रा खतरनाक क्यों है? सार्क विदेशी मुद्रा खतरनाक क्योविदेशी मुद्रा खतरनाक क्यों है? ं है? देशों में व्यापार और पर्यटन को बढ़ावा देने का भी आग्रह किया है।

श्रीलंका की इस गुजारिश को आप इस तरह समझ सकते हैं कि कोई भी श्रीलंकाई नागरिक आरबीआई की अनुमति के बाद अपने पास 8 लाख 26 हजार 823 रुपये यानी 10 हजार अमेरिकी डॉलर नकद रख सकता है. इसका दूसरा अर्थ यह है कि भारत और श्रीलंका के व्यापारी और आम नागरिक अमेरिकी डॉलर के बजाय भारतीय रुपये में आसानी से विदेशी मुद्रा खतरनाक क्यों है? व्यापार और खरीदारी कर सकेंगे। भारत सरकार ने अमेरिकी डॉलर की कमी का सामना कर रहे देशों को एक वैकल्पिक लेनदेन प्रणाली प्रदान करने के उद्देश्य से इस साल जुलाई में इस महत्वाकांक्षी पहल की शुरुआत की थी। ऐसे देशों को विशेष वोस्ट्रो खाते खोलकर रुपये निपटान प्रणाली के तहत लाना होता है, जिसके बाद भारतीय रुपये में लेनदेन सीधे भारत और उन देशों के बीच शुरू किया जा सकता है। अब समझते हैं कि श्रीलंका ने भारत की यह पहल फौरन क्यों की है। दरअसल, पिछले 2 साल से आर्थिक संकट से जूझ रहे श्रीलंका को अमेरिकी डॉलर की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है, जिससे वह दुनिया के दूसरे देशों से अपनी जरूरत की अन्य चीजें नहीं खरीद पा रहा है। इसकी अपनी मुद्रा श्रीलंकाई रुपये की अंतरराष्ट्रीय बाजार में ज्यादा कीमत नहीं है। इसलिए उसे ऐसी करेंसी की जरूरत है, जिसकी विश्व में विश्वसनीयता विदेशी मुद्रा खतरनाक क्यों है? हो और जो उसे आसानी से उपलब्ध भी हो।

विदेशी मुद्रा खतरनाक क्यों है?

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रूस-चीन सोचते रह गए लेकिन भारत ने कर दिखाया, अमेरिका डॉलर को पछाड़कर भारतीय रुपया बनने जा रहा इंटरनेशल करेंसी; जानें कैसे

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बिज़नेस न्यूज़ डेस्क - जब पूरी दुनिया कोरोना महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण संकट में है, तब भारत ने एक ऐसा बड़ा काम शुरू किया है, जो आगे चलकर सही मायने में दुनिया की दूसरी महाशक्ति के रूप में स्थापित होगा। पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने रुपये को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनाने की पहल शुरू की है, जिसे अच्छा रिस्पॉन्स भी मिलना शुरू हो गया है। अगर यह पहल सफल होती है तो अमेरिकी डॉलर के अलावा रुपया दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बन जाएगा। जिसके बाद आप भारतीय रुपये से दुनिया में कहीं भी खरीदारी कर सकेंगे। सहयोगी वेबसाइट WION के मुताबिक, अमेरिकी डॉलर की किल्लत से जूझ रहे श्रीलंका ने यहां स्पेशल रुपी ट्रेडिंग अकाउंट शुरू किया है ऐसे खातों को वोस्त्रो खाते भी कहा जाता है। इस खाते को खोलने के बाद श्रीलंका के सेंट्रल बैंक ऑफ श्रीलंका (CBSL) ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से श्रीलंका में भारतीय रुपये को विदेशी मुद्रा के रूप में मान्यता देने का अनुरोध किया है। श्रीलंका ने आरबीआई से श्रीलंका सहित सार्क देशों में व्यापार और पर्यटन को विदेशी मुद्रा खतरनाक क्यों है? बढ़ावा देने का भी आग्रह किया है।

श्रीलंका की इस गुजारिश को आप इस तरह समझ सकते हैं कि कोई भी श्रीलंकाई नागरिक आरबीआई की अनुमति के बाद अपने पास 8 लाख 26 हजार 823 रुपये यानी 10 हजार अमेरिकी डॉलर नकद रख सकता है. इसका दूसरा अर्थ यह है कि भारत और श्रीलंका के व्यापारी और आम नागरिक अमेरिकी डॉलर के बजाय भारतीय रुपये में आसानी से व्यापार और खरीदारी कर सकेंगे। भारत सरकार ने अमेरिकी डॉलर की कमी का सामना कर रहे देशों को एक वैकल्पिक लेनदेन प्रणाली प्रदान करने के उद्देश्य से इस साल जुलाई में इस महत्वाकांक्षी पहल की शुरुआत की थी। ऐसे देशों को विशेष वोस्ट्रो खाते खोलकर रुपये निपटान प्रणाली के तहत लाना होता है, जिसके बाद भारतीय रुपये में लेनदेन सीधे भारत और उन देशों के बीच शुरू किया जा सकता है। अब समझते हैं कि श्रीलंका ने भारत की यह पहल फौरन क्यों की है। दरअसल, पिछले 2 साल से आर्थिक संकट से जूझ रहे श्रीलंका को अमेरिकी डॉलर की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है, जिससे वह दुनिया के दूसरे देशों से अपनी जरूरत की अन्य चीजें नहीं खरीद पा रहा है। इसकी अपनी मुद्रा श्रीलंकाई रुपये की अंतरराष्ट्रीय बाजार में ज्यादा कीमत नहीं है। इसलिए उसे ऐसी करेंसी की जरूरत है, जिसकी विश्व में विश्वसनीयता हो और जो उसे आसानी से उपलब्ध भी हो।

जरुरी जानकारी | डिजिटल रुपये से परिचालन दक्षता बढ़ेगी, वित्तीय समावेशन को बढ़ावा मिलेगा : चौधरी

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on Information at LatestLY हिन्दी. रिजर्व बैंक के कार्यकारी निदेशक अजय कुमार चौधरी ने बृहस्पतिवार को डिजिटल रुपये की पेशकश को ऐतिहासिक मील का पत्थर बताया।

जरुरी जानकारी | डिजिटल रुपये से परिचालन दक्षता बढ़ेगी, वित्तीय समावेशन को बढ़ावा मिलेगा : चौधरी

नयी दिल्ली, 22 दिसंबर रिजर्व बैंक के कार्यकारी निदेशक अजय कुमार चौधरी ने बृहस्पतिवार को डिजिटल रुपये की पेशकश को ऐतिहासिक मील का पत्थर बताया।

उन्होंने कहा कि इस कदम से प्रणाली में परिचालन कार्यकुशलता और वित्तीय समावेशन को बढ़ावा मिलेगा।

केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (सीबीडीसी) ट्रैकर के अनुसार, दुनिया के 95 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का प्रतिनिधित्व करने वाले लगभग 105 देशों ने डिजिटल मुद्रा की अपनाने की दिशा में कदम उठाए हैं।

चौधरी ने पीएचडी चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (पीएचडीसीसीआई) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि लगभग 50 देश डिजिटल मुद्रा पेश करने की तैयारी कर रहे हैं, जबकि 10 देश डिजिटल मुद्रा की पेशकश कर चुके हैं।

उन्होंने कहा कि डिजिटल रुपया भुगतान के तरीके में नवाचार को बढ़ावा देगा और इससे लचीलापन बढ़ेगा।

चौधरी ने डिजिटल मुद्रा और यूपीआई के बीच के अंतर को समझाते हुए कहा कि भौतिक मुद्रा की तरह, केंद्रीय बैंक द्वारा जारी की गई डिजिटल मुद्रा आरबीआई की देनदारी है, जबकि यूपीआई भुगतान का एक साधन है और यूपीआई के जरिये किया गया कोई भी लेनदेन संबंधित बैंक की देनदारी है।

(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)

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